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द्रोण पर्व
अध्याय ५६
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सञ्जय़ उवाच
स्मय़मानस्तु गोविन्दः फल्गुनं प्रत्यभाषत |  ५   क
सुप्यतां पार्थ भद्रं ते कल्याणाय़ व्रजाम्यहम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति