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सभा पर्व
अध्याय ५६
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विदुर उवाच
दुर्योधनो ग्लहते पाण्डवेन; प्रिय़ाय़से त्वं जय़तीति तच्च |  ५   क
अतिनर्माज्जाय़ते सम्प्रहारो; यतो विनाशः समुपैति पुंसाम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति