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शान्ति पर्व
अध्याय ५६
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वैशम्पाय़न उवाच
अत्र वै सम्प्रमूढे तु धर्मे राजर्षिसेविते |  ६   क
लोकस्य संस्था न भवेत्सर्वं च व्याकुलं भवेत् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति