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शल्य पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
त्वत्कृतेऽसौ हतः शेते शरतल्पे प्रतापवान् |  ३१   क
गाङ्गेय़ो रथिनां श्रेष्ठो निहतो याज्ञसेनिना ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति