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शल्य पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
द्रौपदी च परिक्लिष्टा सभाय़ां यद्रजस्वला |  २९   क
द्यूते च वञ्चितो राजा यत्त्वय़ा सौवलेन च ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति