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शल्य पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
अद्याय़ुर्धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेरकृतात्मनः |  २३   क
समाप्तं भरतश्रेष्ठ मातापित्रोश्च दर्शनम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति