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द्रोण पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
व्रह्मचर्येण यां यान्ति मुनय़ः संशितव्रता |  २४   क
एकपत्न्यश्च यां यान्ति तां गतिं व्रज पुत्रक ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति