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द्रोण पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
गोसहस्रप्रदातॄणां क्रतुदानां च या गतिः |  २३   क
नैवेशिकं चाभिमतं ददतां या गतिः शुभा ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति