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उद्योग पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
माद्रीपुत्रं नकुलं त्वाजमीढं; महेन्द्रदत्ता हरय़ो वाजिमुख्याः |  १५   क
समा वाय़ोर्वलवन्तस्तरस्विनो; वहन्ति वीरं वृत्रशत्रुं यथेन्द्रम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति