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वन पर्व
अध्याय ५५
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वृहदश्व उवाच
एवमुक्तस्तु शक्रेण कलिः कोपसमन्वितः |  ५   क
देवानामन्त्र्य तान्सर्वानुवाचेदं वचस्तदा ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति