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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५५
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः कदाचिद्राजेन्द्र काष्ठान्यानय़ितुं यय़ौ |  ८   क
उत्तङ्कः काष्ठभारं च महान्तं समुपानय़त् ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति