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शान्ति पर्व
अध्याय ५५
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्तस्तु भीष्मेण धर्मराजो युधिष्ठिरः |  १८   क
विनीतवदुपागम्य तस्थौ सन्दर्शनेऽग्रतः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति