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शान्ति पर्व
अध्याय ५५
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वासुदेव उवाच
लोकस्य कदनं कृत्वा लोकनाथो विशां पते |  १२   क
अभिशापभय़ाद्भीतो भवन्तं नोपसर्पति ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति