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आदि पर्व
अध्याय ५५
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वैशम्पाय़न उवाच
त उक्ता धृतराष्ट्रेण राज्ञा शान्तनवेन च |  २३   क
भ्रातृभिर्विग्रहस्तात कथं वो न भवेदिति |  २३   ख
अस्माभिः खाण्डवप्रस्थे युष्मद्वासोऽनुचिन्तितः ||  २३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति