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शल्य पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमभिधावन्तौ मत्ताविव महाद्विपौ |  २७   क
वाशितासङ्गमे दृप्तौ शरदीव मदोत्कटौ ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति