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शल्य पर्व
अध्याय ५४
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वैशम्पाय़न उवाच
रामं संनिहितं दृष्ट्वा गदाय़ुद्ध उपस्थिते |  २   क
मम पुत्रः कथं भीमं प्रत्ययुध्यत सञ्जय़ ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति