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उद्योग पर्व
अध्याय ५४
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दुर्योधन उवाच
प्रणिपाते तु दोषोऽस्ति वन्धूनां शाश्वतीः समाः |  १४   क
पितरं त्वेव शोचामि प्रज्ञानेत्रं जनेश्वरम् |  १४   ख
मत्कृते दुःखमापन्नं क्लेशं प्राप्तमनन्तकम् ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति