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विराट पर्व
अध्याय ५४
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः कर्णो महच्चापं विकृष्याभ्यधिकं रुषा |  १५   क
अवाक्षिपत्ततः शव्दो हाहाकारो महानभूत् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति