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वन पर्व
अध्याय ५४
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वृहदश्व उवाच
वाचा च मनसा चैव नमस्कारं प्रय़ुज्य सा |  १६   क
देवेभ्यः प्राञ्जलिर्भूत्वा वेपमानेदमव्रवीत् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति