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सभा पर्व
अध्याय ५४
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्तः शकुनिः प्राह जितमित्येव तं नृपम् |  ३   क
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति