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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
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वैशम्पाय़न उवाच
मय़ा त्वदर्थमुक्तो हि वज्रपाणिः पुरन्दरः |  २६   क
उत्तङ्काय़ामृतं देहि तोय़रूपमिति प्रभुः ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति