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शान्ति पर्व
अध्याय ५४
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भीष्म उवाच
युवेव चास्मि संवृत्तस्त्वदनुध्यानवृंहितः |  २३   क
वक्तुं श्रेय़ः समर्थोऽस्मि त्वत्प्रसादाज्जनार्दन ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति