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द्रोण पर्व
अध्याय ५३
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सञ्जय़ उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं स्वय़मात्मानमात्मना |  ५५   क
सन्दिदेशार्जुनो नर्दन्वासविः केशवं प्रभुम् ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति