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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
अथ गाण्डीवमुद्यम्य दिव्यं धनुरमर्षणः |  ५८   क
विचकर्ष रणे पार्थो वाहुभ्यां भरतर्षभ ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति