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विराट पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
दृष्ट्वा तु पार्थस्य रणे शरैः स्वरथमावृतम् |  ३३   क
स विस्फार्य धनुश्चित्रं मेघस्तनितनिस्वनम् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति