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विराट पर्व
अध्याय ५३
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अर्जुन उवाच
यत्रैषा काञ्चनी वेदी प्रदीप्ताग्निशिखोपमा |  १   क
उच्छ्रिता काञ्चने दण्डे पताकाभिरलङ्कृता |  १   ख
तत्र मां वह भद्रं ते द्रोणानीकाय़ मारिष ||  १   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति