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शान्ति पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
तत उत्थाय़ दाशार्हः स्नातः प्राञ्जलिरच्युतः |  ७   क
जप्त्वा गुह्यं महावाहुरग्नीनाश्रित्य तस्थिवान् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति