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शान्ति पर्व
अध्याय ५३
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वैशम्पाय़न उवाच
पठन्ति पाणिस्वनिकास्तथा गाय़न्ति गाय़नाः |  ४   क
शङ्खानकमृदङ्गांश्च प्रवाद्यन्त सहस्रशः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति