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आदि पर्व
अध्याय ५३
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आस्तीक उवाच
साय़ं प्रातः सुप्रसन्नात्मरूपा; लोके विप्रा मानवाश्चेतरेऽपि |  २०   क
धर्माख्यानं ये वदेय़ुर्ममेदं; तेषां युष्मद्भ्यो नैव किञ्चिद्भय़ं स्यात् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति