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कर्ण पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
एतत्ते सुकृतं कर्म नात्र किञ्चिन्न युज्यते |  ५९   क
वय़मप्यत्र जानीमो नात्र दोषोऽस्ति कश्चन ||  ५९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति