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कर्ण पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
गत्या दशम्या ते गत्वा जघ्नुर्वाजिरथद्विपान् |  २९   क
हित्वा नव गतीर्दुष्टाः स वाणान्व्याय़तोऽमुचत् ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति