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द्रोण पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
यदि विशति रसातलं तदग्र्यं; विय़दपि देवपुरं दितेः पुरं वा |  ३९   क
तदपि शरशतैरहं प्रभाते; भृशमभिपत्य रिपोः शिरोऽभिहर्ता ||  ३९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति