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द्रोण पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
संश्रितं वापि यस्त्यक्त्वा साधुं तद्वचने रतम् |  ३३   क
न विभर्ति नृशंसात्मा निन्दते चोपकारिणम् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति