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वन पर्व
अध्याय ५१
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वृहदश्व उवाच
दमय़न्ती तु तच्छ्रुत्वा वचो हंसस्य भारत |  १   क
तदा प्रभृति नस्वस्था नलं प्रति वभूव सा ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति