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सभा पर्व
अध्याय ५१
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शकुनिरु उवाच
ग्लहान्धनूंषि मे विद्धि शरानक्षांश्च भारत |  ३   क
अक्षाणां हृदय़ं मे ज्यां रथं विद्धि ममास्तरम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति