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सभा पर्व
अध्याय ५१
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्त्वा धृतराष्ट्रो मनीषी; दैवं मत्वा परमं दुस्तरं च |  १६   क
शशासोच्चैः पुरुषान्पुत्रवाक्ये; स्थितो राजा दैवसंमूढचेताः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति