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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रभाताय़ां तु शर्वर्यां कृतपूर्वाह्णिकक्रिय़ौ |  ३४   क
धर्मराजस्य भवनं जग्मतुः परमार्चितौ |  ३४   ख
यत्रास्ते स सहामात्यो धर्मराजो महामनाः ||  ३४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति