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शान्ति पर्व
अध्याय ५१
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वैशम्पाय़न उवाच
मत्संश्रितं यदात्थ त्वं वचः पुरुषसत्तम |  ५   क
तेन पश्यामि ते दिव्यान्भावान्हि त्रिषु वर्त्मसु ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति