कर्ण पर्व  अध्याय ५०

सञ्जय़ उवाच

उवाच भरतश्रेष्ठ प्रसीदेति पुनः पुनः |  १०   क
क्षमस्व राजन्यत्प्रोक्तं धर्मकामेन भीरुणा ||  १०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति