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द्रोण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
वज्रसारमय़ं नूनं हृदय़ं सुदृढं मम |  ४९   क
अपश्यतो दीर्घवाहुं रक्ताक्षं यन्न दीर्यते ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति