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द्रोण पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
कृतज्ञं ज्ञानसम्पन्नं कृतास्त्रमनिवर्तिनम् |  ३१   क
युद्धाभिनन्दिनं नित्यं द्विषतामघवर्धनम् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति