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भीष्म पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
भीमेन समरे राजन्गजेन्द्रेणेव सर्वतः |  ७९   क
मार्गान्वहून्विचरता धावता च ततस्ततः |  ७९   ख
मुहुरुत्पतता चैव संमोहः समजाय़त ||  ७९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति