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उद्योग पर्व
अध्याय ५०
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धृतराष्ट्र उवाच
वलीय़ः सर्वतो दिष्टं पुरुषस्य विशेषतः |  ४७   क
पश्यन्नपि जय़ं तेषां न निय़च्छामि यत्सुतान् ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति