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विराट पर्व
अध्याय ५०
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अर्जुन उवाच
सदा ममैष मान्यश्च सर्वशस्त्रभृतामपि |  १०   क
एतस्य त्वं रथं प्राप्य निवर्तेथाः पुनः पुनः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति