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वन पर्व
अध्याय ५०
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वृहदश्व उवाच
तत्र स्म भ्राजते भैमी सर्वाभरणभूषिता |  १२   क
सखीमध्येऽनवद्याङ्गी विद्युत्सौदामिनी यथा |  १२   ख
अतीव रूपसम्पन्ना श्रीरिवाय़तलोचना ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति