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शल्य पर्व
अध्याय ५
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शल्य उवाच
यत्तु मां मन्यसे राजन्कुरुराज करोमि तत् |  २५   क
त्वत्प्रिय़ार्थं हि मे सर्वं प्राणा राज्यं धनानि च ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति