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कर्ण पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
भीष्मद्रोणौ हि समरे न हन्याद्वज्रभृत्स्वय़म् |  ६३   क
न्याय़ेन युध्यमानौ हि तद्वै सत्यं व्रवीमि ते ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति