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द्रोण पर्व
अध्याय ५
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सञ्जय़ उवाच
सनाथमिदमत्यर्थं भवता पालितं वलम् |  २   क
मन्ये किं तु समर्थं यद्धितं तत्सम्प्रधार्यताम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति