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विराट पर्व
अध्याय ५
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वैशम्पाय़न उवाच
अन्तरेण यकृल्लोमाञ्शूरसेनांश्च पाण्डवाः |  ४   क
लुव्धा व्रुवाणा मत्स्यस्य विषय़ं प्राविशन्वनात् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति