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वन पर्व
अध्याय ५
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विदुर उवाच
अजातशत्रुर्हि विमुक्तरागो; धर्मेणेमां पृथिवीं शास्तु राजन् |  १३   क
ततो राजन्पार्थिवाः सर्व एव; वैश्या इवास्मानुपतिष्ठन्तु सद्यः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति